श्रीराधा-माधुरी · पद 53
हमारी अलबेली सरकार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī alabelī sarakāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी अलबेली सरकार।
2रसिक रँगीली गुन गर्वीली, रसिकन की रिझवार।
3विधि निषेध, मर्याद वेद की, रहति न येहि दरबार।
4त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिताप नसावति, देति प्रेम-उपहार।
5पलक ढाँपि राखत पुतरिन ज्योँ, प्रणत भये इकबार।
6डरत “कृपालु” जासु डर गिरिधर, सो हमार रखवार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी स्वामिनी रसिकता की सीमा स्वरूपिणी हैं। ने रसिकों को सुख देने वाली, रिझाने वाली तथा समस्त गुणों की खान हैं। इनके दरबार में वेद के विधि निषेध की मर्यादा का प्रवेश नहीं हैं। श्री किशोरी जी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण और संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म एवं दैहिक, दैनिक, भौतिक गपों को नष्ट करके विशुद्ध प्रेम प्रदान करती हैं। एक बार भी शरण में आये हुए जीव को, आँखों में पुतली के समान पलक ने ढाँप कर रखती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जिन किशोरी गी के डर से कालात्मा गिरिधर भी डरते हैं, वे ही हमारी रक्षा मरने वाली, हमारी अलबेली सरकार हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 476