श्रीराधा-माधुरी · पद 52
हम चाकर कुंज विहारिणि के।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hama chākara kuñja bihāriṇi ke
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हम चाकर कुंज विहारिणि के।
2डरत न डर रुक्मिणि वल्लभ अरु, श्री रुक्मिणि अवतारिणि के।
3मुक्ति चार मनुहार करत पै, जाउँ न ढिंग जग तारिणि के।
4नित्य-विहार लखौं गहवर वन, सरस रास-रस कारिणि के।
5बनि अलमस्त नाम गुन गाऊँ, शरणागत-भय हारिणि के।
6जूठनि खाउँ “कृपालु” जाउँ बलि, नित नीलांबरधारिणि के॥
हिन्दी भावार्थ
हम निकुंज विहारिणी स्वामिनी ही के दास हैं। रुक्मिणीवल्लभ श्यामसुन्दर एवं लक्ष्मी की अवतार रुक्मिणी के डर से भी नहीं डरते। संसार से तारने वाली चारों प्रकार को मुक्तियाँ खुशामद करती रहती हैं, किन्तु भूलकर भी हम उनके पास नहीं फटकते। सरस रास-रस बरसाने वाली किशोरी जी की नित्य विहार लीला गह्वर वन में नित्य देखा करते हैं। शरणागत के भय को दूर करने वाली लाड़िलीजी के नाम एवं गुणों को गाते हुए मतवाले बने रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो नीलाम्बर धारण करने वाली वृषभानुनन्दिनी राधिका की जूठन खाकर बलिहार जाता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 475-476