श्रीराधा-माधुरी · पद 51
साध यह पुरवहु राधे! मोर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sādha yaha, puravahu rādhe! mora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1साध यह पुरवहु राधे! मोर।
2बनूँ तिहारी महल-टहलिनी, करहु कृपा की कोर।
3देउँ बुहारी कुंज-महल की, होत साँझ अरु भोर।
4सोइ रुचि राखौं करि आपन, जोइ रुचि देखौं तोर।
5जब रस की बतियन महँ झगरें, तुम सँग नंदकिशोर।
6तब “कृपालु” लउँ पक्ष तिहारोइ, यह रस रसिक अथोर॥
हिन्दी भावार्थ
हे रासेश्वरी राधे! मेरी यह तीव्र उत्कण्ठा पूरी कर दो। अपने कृपा-कटाक्ष द्वारा मुझे अपने महल की दासी बना लो। मेरी यह कामना है कि मैं दासी बन कर नित्य सबेरे-शाम कुंजमहल की बुहारी दिया करूँ एवं तुम्हारी इच्छा को ही अपनी इच्छा मानूँ। एक कामना और है, वह यह है कि जब तुम्हारे साथ दिव्य प्रेमरस की अटपरी बातों में प्रियतम का प्यार भरा झगड़ा हो जाय, 'कृपालु' कहते हैं, तब मैं तुम्हारा ही पक्ष लूँ। यह रसिकों का अन्तरंग गुप्त-रस है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 474-475