श्रीराधा-माधुरी · पद 50
सखी! ये सब के सब बौराये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! ye saba ke saba baurāye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखी! ये सब के सब बौराये।
2श्रीमुख-कमल जानि अंबुज चहुँ, भ्रमर निकर मँडराये।
3अधर बिंब हिय जानि बिंबफल, शुक अहार हित आये।
4वेणी शीश जानि जनु नागिनि, मोर-वृंद ललचाये।
5मधु-वानी सुनि जानि वेनु रव, मृग-कदंब उठि धाये।
6इमि “कृपालु” वृषभानु ललिहिं लखि, सब इक सँग भरमाये॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! यह सब के सब पागल हो गये हैं। देखो तो, किशोरी जी के मुख को साक्षात् कमल समझकर मुख के चारों ओर भौरों के झुण्ड मँडरा रहे हैं। किशोरी जी के अधरों को साक्षात् कुँदरू का फल समझकर तोतों ने चोंच मारने के लिए घेर लिया है एवं किशोरी जी की वेणी को साक्षात् सर्पिणि समझकर मोरों के समुदाय भी उसे खाने के लिए चले आ रहे हैं। किशोरी जी की वाणी को साक्षात् मुरली-ध्वनि समझकर हिरनों के झुण्ड चले आ रहे हैं। 'कृपालु कहंते हैं कि इस प्रकार किशोरी जी को देखकर भौरे, तोते मोर एवं हिरन सभी भ्रम में पड़ गये हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 474