श्रीराधा-माधुरी · पद 37
लखु लालिहिं, लालहिं लाल रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhu lālihiṁ, lālahiṁ lāla re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखु लालिहिं, लालहिं लाल रे।
2सेंदुर लाल बाल बिच सोहत, बिंदी लालहिं भाल रे।
3सोहत लाल फुलन वेणी बिच, राग लालिमा गाल रे।
4अधरहुँ सहज लाल लाली के, लाल कमल गलमाल रे।
5लाल रंग की कंचुकि नीकी, दृग कछु लाल विशाल रे।
6लालहिं मेहँदी, लाल मेहावरि, चुनरि लाल सिर डाल रे।
7कहँ लौं कहौं “कृपालु” लली के, उरहूँ लाल गुपाल रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! देख आज किशोरी जी ने लाल-लाल शृंगार किया है। बालों के बीच में लाल रंग का सेंदुर सुशोभित हो रहा है। ललार में लाल रंग की बिन्दी नितांत कमनीय है। वेणी के बीच-बीच में लाल रंग के फूल अत्यन्त ही सुन्दर लग रहे हैं। गालों पर लाल-रंग की लालिमा दर्शनीय है। अधरों में स्वाभाविक लालिमा है। गले में लाल कमलों की माला पहने हुए हैं। लाल रंग की कंचुकी भी अत्यन्त कमनीय है। बड़े-बड़े नेत्रों में भी स्वभावतः कुछ लाली झलक रही है। हाथ में मेहँदी एवं चरणों में मिहावर भी लाल रंग की लगी हुई है। सिर पर चुनरी भी लाल रंग की ओढ़ रखी है। 'कृपालु' कहते हैं कि और कहाँ तक कहें लाडली जी के हृदय में भी तो गोपाल लाल विद्यमान हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 462-463