श्रीराधा-माधुरी · पद 38
लतन में ठाढ़ीं भानुदुलार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: latana meṁ ṭhād̤hīṁ bhānudulāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लतन में ठाढ़ीं भानुदुलार।
2मणिन-अलंकृत कनक मुकुट सिर, लर मोतिन श्रृंगार।
3अति कारी एँड़ी लौं वेणी, अनियारी घुँघरार।
4कानन करणफूल मणि मंडित, बिंदी अति अरुणार।
5दृग रस भरे सहज कजरारे, मतवारे रतनार।
6झलमलात मुक्ताहल नासा, नथ बेसर छबिदार।
7मंद मंद मुसकानि दशन दुति, चंद्र लजावनि हार।
8उर कंचुकि लर हार मोतियन, नीलांबर रिझवार।
9कनकन कर कंकन, कटि किंकिनि, नूपुर धुनि झनकार।
10लाल मिहावरि लाल ओढ़नी, लालहिं मेहँदी सार।
11लखि “कृपालु” श्रृंगार किशोरिहिं, भाल दिठौना डार॥
हिन्दी भावार्थ
लताओं में वृषभानुनन्दिनी खड़ी हैं, उनके सुवर्ण के मुकुट में मणियाँ जड़ी हुई हैं एवं मोतियों की लड़ियों का शृंगार हुआ है। उनकी वेणी एड़ी तक लम्बी है तथा अत्यन्त काली, घनी एवं घुँघराली है। उनके कान में मणियों से जड़े हुए कर्णफूल एवं उनके ललाट में लाल रंग की बिन्दी शोभायमान है। उनके नेत्र स्वभावतः कजरारे, रसभरे, हल्के लाल रंग के हैं। उनकी नासिका में मुक्ताहल झलमला रही है एवं नथ और बेसर सुशोभित है। उनकी मंद-मंद मुस्कान के कारण दाँतों की चमक चन्द्रमा को लज्जित कर रही है। उनके वक्षःस्थल पर चोली एवं मोतियों के हार अलंकृत हैं। नीलाम्बर की झाँकी निराली ही है। हाथ में सुवर्ण के कंकण, कमर में सुवर्ण को किंकिणी, पैर में सुवर्ण के नूपुर एवं इन सब की झनकार अत्यन्त ही मनोहारिणी है। पैरों में लाल मिहावर, सिर पर लाल ओढ्नी, हाथ में लाल मेहंदी सुशोभित हो रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी की उपर्युक्त शृंगार माधुरी को देखकर मैंने उनके ललाट में एक काला दिठौना लगा दिया ताकि श्यामसुन्दर की नज़र न लग जाय।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 463-464