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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 39

लली की अति मतवाली चाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī kī ati matavālī chāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लली की अति मतवाली चाल।

2लखतहिं होत बेहाल लाल जू, एतिक चाल रसाल।

3ललिहिं चाल लखि मानसरोवर, छुपि गये बाल मराल।

4गये भाजि गजराज लाजवश, दुरे विपिन विकराल।

5जनकादिक सनकादि शुकादिक, तजत समाधिहुँ हाल।

6चाल रसाल “कृपालु” लखति नित, बड़भागिनि ब्रजबाल॥

हिन्दी भावार्थ

रासेश्वरी वृषभानुनन्दिनी की चाल अत्यन्त ही मदभरी है, जिसे देखकर त्रिभुवन विख्यात मतवाली चाल के शिरोमणि गन्दलाल भी बेहाल हो जाते हैं। लाडली जी की मतवाली चाल देखकर ही राजहंस मान-सरोवर में जाकर छिप गये हैं उन राजहंसों को अपनी चाल का बड़ा अहंकार था। इसी प्रकार मतवाले बनेले-गजराज भी सघन-वन में जाकर छिप गये हैं। जनक, सनक, शुकदेवादि बड़े-बड़े अमलात्मा परमहँस चाल देखते ही तत्काल समाधि खो बैठते हैं। 'कृपालु' कहते हैं उन ब्रजागनाओं के भाग्य की कौन सराहना कर सकता है जिन्हें ऐसी मतवाली चाल के देखने का सौभाग्य प्रतिक्षण प्राप्त है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 464-465