श्रीराधा-माधुरी · पद 36
लखी जिन भानुलली मुसकान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakhī jina bhānulalī musakāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखी जिन भानुलली मुसकान।
2भूलि जात मुसकान मधुर तिन, सुंदर श्याम सुजान।
3सो न जानि सक ज्ञानिन गर्दभ, महली रसिकन जान।
4टुक मुसकान लखन हित मोहन, वारत तन मन प्रान।
5लखतहिं बरबस बिसरि जाति सुधि, सनक समाधिन ध्यान।
6धनि “कृपालु” तिन गोप-वधूटिन, निरखत जिन रह भान॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनन्दिनी राधिका जी की मधुरता से भी मधुर मुस्कान जिसने भी देख ली है वह रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर के मुस्कराने की मधुरता को बरबस ही भूल जाता है। इस अन्तरंग रस को महल में रहने वाले सखि-भाव-युक्त रसिक ही जान सकते हैं, नीरस-शब्द-भार-वाही गधे के समान ज्ञानी नहीं जान सकते। किशोरी जी की थोड़ी सी मुस्कान माधुरी के दर्शनार्थ मदनमोहन श्यामसुन्दर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। किशोरी जी की मुस्कान-माधुरी को देखकर सनकादिक परमहँस अपने समाधिस्थ ध्यान को बरबस भूल जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि आश्चर्य है कि ये स्वनामधन्य गोपांगनाएँ ऐसी मुस्कान माधुरी का रसपान करते हुए भी किशोरी जी की सेवा कर पाती हैं अर्थात् मूर्च्छित नहीं होती। (यह योग-माया की शक्ति का चमत्कार है)।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 461-462