# लखी जिन भानुलली मुसकान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0478-M10-K036
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 36
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 223–223

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>लखी जिन भानुलली मुसकान।  
<a id="line-2"></a>भूलि जात मुसकान मधुर तिन, सुंदर श्याम सुजान।  
<a id="line-3"></a>सो न जानि सक ज्ञानिन गर्दभ, महली रसिकन जान।  
<a id="line-4"></a>टुक मुसकान लखन हित मोहन, वारत तन मन प्रान।  
<a id="line-5"></a>लखतहिं बरबस बिसरि जाति सुधि, सनक समाधिन ध्यान।  
<a id="line-6"></a>धनि “कृपालु” तिन गोप-वधूटिन, निरखत जिन रह भान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्री वृषभानुनन्दिनी राधिका जी की मधुरता से भी मधुर मुस्कान जिसने भी देख ली है वह रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर के मुस्कराने की मधुरता को बरबस ही भूल जाता है। इस अन्तरंग रस को महल में रहने वाले सखि-भाव-युक्त रसिक ही जान सकते हैं, नीरस-शब्द-भार-वाही गधे के समान ज्ञानी नहीं जान सकते। किशोरी जी की थोड़ी सी मुस्कान माधुरी के दर्शनार्थ मदनमोहन श्यामसुन्दर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। किशोरी जी की मुस्कान-माधुरी को देखकर सनकादिक परमहँस अपने समाधिस्थ ध्यान को बरबस भूल जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि आश्चर्य है कि ये स्वनामधन्य गोपांगनाएँ ऐसी मुस्कान माधुरी का रसपान करते हुए भी किशोरी जी की सेवा कर पाती हैं अर्थात् मूर्च्छित नहीं होती। (यह योग-माया की शक्ति का चमत्कार है)।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 461-462

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
