श्रीराधा-माधुरी · पद 27
बलि जाउँ लली वृषभान की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bali jāuṁ lalī vṛishabhāna kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बलि जाउँ लली वृषभान की।
2रूप उजारी भानुदुलारी, प्रानन प्यारी कान्ह की।
3रति-रस-बातन, बितवति रातन, घातन नेह सुजान की।
4गति गज गामिनि, छवि अभिरामिनि, दुति दामिनि उनमान की।
5मंजु निकुंजनि भृंगनि पुंजनि, गुंजनि सुनि किय मान की।
6हम “कृपालु” मानिनि लखि स्वामिनि, करत निछावर प्रान की॥
हिन्दी भावार्थ
वृषभानुनंदिनी श्रीराधिका जी की मैं बार-बार बलैया लेता हूँ। अनुपम रूप वाली वृषभानुलाड्ली एवं श्यामसुन्दर की प्राणों से भी अधिक प्यारी किशोरी जी की बलैया लेता हूँ। प्रेम की परम अन्तरंग बातों को करते हुए सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत करने वाली एवं प्रेम के मार्मिक विषयों की आचार्या किशोरी जी की बार-बार बलैया लेता हूँ। मतवाले गजराज के समान आ वाली, सुन्दरता को भी लज्जित करने वाली एवं बिजली के समान कान्तिवाली किशोरी जी की बलैया लेता हूँ। मनोहर लताओं के कुंज में भौरों के झुंड के गुंजार को सुनकर मान अवस्था को प्राप्त ( भ्रमरगीत) किशोरी जी की बार-बार बलैया लेता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो किशोरी जी को मान अवस्था में देखकर आनंद में अपने प्राणों को निछावर कर रहा हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 455