श्रीराधा-माधुरी · पद 28
बलि जाउँ लली सुकुमार की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bali jāuṁ lalī sukumāra kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बलि जाउँ लली सुकुमार की।
2सकल सहेली संग नवेली, अलबेली सरकार की।
3नवल किशोरी, रति-रसबोरी, भोरी भानुदुलार की।
4अभिरामिनि, गजगामिनि भामिनी, स्वामिनि नंदकुमार की।
5रूप उजागरि राधा नागरि, जनु मूरति श्रृंगार की।
6लखि “कृपालु” छवि सुधा-माधुरी, पियत प्रेम-रस धार की॥
हिन्दी भावार्थ
मैं वृषभानुनन्दिनी की बार-बार बलैया लेता हूँ। समस्त गोपियों के साथ नित्य नूतन अलबेली सरकार की बलैया लेता हूँ। नित्य ही किशोर अवस्था वाली एवं प्रेम रस में सराबोर भोली-भाली वृषभानुदुलारी की बलैया लेता हूँ। मतवाले गजराज से भी मनोहर चाल वाली श्यामसुन्दर की स्वामिनी की बलैया लेता हूँ। अनुपम रूप वाली मूर्तिमान शृंगार-स्वरूपा, परम रस चतुर राधिका की बलैया लेता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसे ही अनुपम रूपमाधुरी को पीकर मैं प्रेम रस की धारा में बह जाता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 456