श्रीराधा-माधुरी · पद 29
मम स्वामिनि गुन की आगरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mama swāmini guna kī āgarī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मम स्वामिनि गुन की आगरी।
2गति गज गामिनि छवि अभिरामिनि, राधा नामिनि नागरी।
3रूपहिं देति साँचु जो रूपहिं, प्रकटी रूप उजागरी।
4गहवर-मंजु-निकुंजनि पुंजनि, विहरति अति अनुराग री।
5कुँवरि चरन चापन हित आपन, ब्रह्म मनावत भाग री।
6पग पर धरत “कृपालु” पागरी, सरस-प्रेम-रस-पाग री॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी स्वामिनी जी अनन्त गुणों की खानि हैं। वे मतवाले हाथी की तरह चलती हैं, उनकी छवि अत्यन्त सुन्दर है। उनका नाम राधा है। वे ऐसी रूप वाली हैं जिनके द्वारा मूर्तिमान रूप भी रूप पाकर रूपवान रहता है। वे प्रेम-रस विभोर होकर निरंतर गह्वर वन की सुन्दर लता कुंजों में विहार करती हैं। उनके चरणों को दबाने में ब्रह्म श्यामसुन्दर भी अपना अहोभाग्य मानते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर हमारी स्वामिनी के चरणों पर अपने सिर की पगड़ी रखते हुए बलिहार जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 456-457