श्रीराधा-माधुरी · पद 30
मम स्वामिनि छवि अभिरामिनी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mama swāmini chhavi abhirāminī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मम स्वामिनि छवि अभिरामिनी।
2गौर वदनि, मृदु हँसनि दशन-दुति, दमकति जनु दुति दामिनी।
3रोम रोम ते प्रेमसुधारस, छलकावति नित भामिनी।
4सो रस पियत अघात न मोहन, मानि आपनी स्वामिनी।
5चलति लली झुकि झूमि झूमि इमि, लजवति गति गजगामिनी।
6लखौं “कृपालु” कबहुँ हमहूँ छवि, स्वामिनि राधा नामिनी॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी स्वामिनी जी का रूप सर्वथा अनुपम है उनके गोरे शरीर की चमक, मंद-मंद मुस्कान तथा दाँतों की चमक, बिजली की चमक को भी लज्जित करती है। उनके रोम-रोम से प्रेम-रस छलकता रहता है। जिस रस को पीत हुए श्यामसुन्दर नहीं अघाते। वे श्यामसुन्दर की भी स्वामिन हैं। वे जब झुमती हुई चलती हैं तो मदमत्त गजराज भी लज्जिः हो जाता है। 'कृपालु' कहते हैं कि हम भी कभी उन स्वामिन राधा जी के दर्शन करके कृतार्थ होंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 457