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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 31

मम स्वामिनि राधा नामिनी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mama swāmini rādhā nāminī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1मम स्वामिनि राधा नामिनी।

2रति-रस-सरस-रास-रस लंपट, रसिक शिरोमणि स्वामिनी।

3त्रिभुवन-मोहनहूँ मन मोहिनि, लजवति गति गज-गामिनी।

4अगणित उमा रमा ब्रह्माणी, गावति गुण गण भामिनी।

5विहरति ललित लवंग निकुंजनि, संग सखिन दिन यामिनी।

6कृपा कृपालु “कृपालु” किशोरिहिं, लखि सक छवि अभिरामिनी॥

हिन्दी भावार्थ

मेरी स्वामिनी एकमात्र श्री राधिका जी ही हैं। सरस भी जिनको अपनी स्वामिनी मानते हैं। त्रैलोक्य को मोहित करने वाले मदन-मोहन के भी मन को मोहित करती हैं। वे अपनी चाल से मतवाले हाथी को भी लज्जित करती हैं। उनके अनन्त गुणों को अनन्त पार्वती, लक्ष्मी एवं ब्रह्माणी निरंतर गाया करती हैं। वे सुन्दर लवंग की कुंजों में दिन रात सखियों के साथ विहार करती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उन्हीं दयामयी किशोरी जी की कृपा से कोई बड़भागी उनकी बाँकी झाँकी का दर्शन कर सकता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 458