श्रीराधा-माधुरी · पद 32
मोहिं स्वामिनि! अपनी मान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohiṁ swāmini! apanī māna re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोहिं स्वामिनि! अपनी मान रे।
2तुम्हरे चरण कमल कहँ ध्यावत, गावत नित गुनगान रे।
3भुक्ति मुक्ति नहिं माँगति स्वामिनि, माँगति यह वरदान रे।
4करौं टहल बनि महल टहलिनी, उर न कामना आन रे।
5देउँ बुहारी पलकनि महलनि, लेउँ कबहुँ पिकदान रे।
6खाय “कृपालु” जाउँ बलि कबहुँक, जूठन मुख के पान रे॥
हिन्दी भावार्थ
हे किशोरी जी! मुझे अपनी दासी बना लीजिए। हम केवल तुम्हारे चरण-कमलों का ध्यान करते हैं एवं तुम्हारे ही गुणों को गाते हैं। हम भुक्ति मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते। हे स्वामिनी जी! हम तो एक ही वरदान माँगते हैं कि तुम्हारे महल की दासी बनकर नित्य दासता करती रहूँ, अन्य कोई भी कामना नहीं है। अपनी आँखों की पलकों से महल में बुहारी लगाया करूँ। कभी पीकदान लिये रहूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि क्या कभी ऐसा भी दिन होगा जब तुम्हारे मुख के जूठे पान खा कर बलिहार जाऊँगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 458-459