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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 33

रँगीली राधा रसिकन प्रान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: raṁgīlī rādhā rasikana prāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1रँगीली राधा रसिकन प्रान।

2सरस किशोरी की रसबोरी, भोरी मृदु मुसकान।

3सुबरन बरन गौर तनु सुबरन, नील बरन परिधान।

4कनकन मुकुट लटनि की लटकनि, भृकुटिन कुटिल कमान।

5कनकन कंकन कनकन किंकिनि, कनकन कुंडल कान।

6लखि लाजत श्रृंगार लाड़लिहिं, कहँ लौं करिय बखान।

7होत “कृपालु” निछावर जापर, सुंदर श्याम सुजान॥

हिन्दी भावार्थ

रंगीली राधा रसिकों को प्राण के समान प्रिय हैं। रसमयी किशोरी जी की प्रेम रस से सरोबार भोली सी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है। किशोरी जी की देह का रंग सुवर्ण के रंग के समान अत्यन्त सुन्दर है। हैं। सुवर्ण के मुकुट, घुँघराले बालों की लटक एवं धनुष के समान टेढ़ी भौंहें नितांत कमनीय हैं। को बरबस लुभा रहे हैं। माधुरी को देखकर स्वयं श्रृंगार भी लज्जित हो रहा है। कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि त्रिभुवन मोहन मदन मोहन भी स्वयं किशोरी जी के हाथों बिना दाम के बिके हुए हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 459-460