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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 34

राधे तोरे, अरुण चरण पर वारी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rādhe tore, aruṇa-charaṇa para vārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1राधे तोरे, अरुण चरण पर वारी।

2तव पद-लव शोभा लखि पल्लव, नाम धर्यो कवि झारी।

3उमा, रमा, ब्रह्माणी आदिक, सदा चरण सिर धारी।

4सोइ सुहाग-सिंदूर मनहुँ भइ, चरण अरुणिमा सारी।

5दोउ पद-दश नख चंद्र-चंद्रिका, चमकति चरण मझारी।

6बड़भागी “कृपालु” शशि-अंबुज, भये संग अधिकारी॥

हिन्दी भावार्थ

हे किशोरी जी! तुम्हारे चरण कमलों की लालिमा पर मैं बलिहार जाता हूँ। तुम्हारे चरणों की लवलेश शोभा होने के ही कारण कवियों ने आम के नये पत्तों का नाम पल्लन रखा है। अतएव तुम्हारे चरणों की लालिमा का उपमान पल्लव नहीं हो सकता। मेरे मन में तो पार्वती, लक्ष्मी एवं ब्रह्माणी आदि तुम्हारे चरणों को सदा अपने सिर पर रखती हैं, अतएव उनके सुहाग के सिंदूर लग-लगकर ही किशोरी जी के चरण लाल हो गये हैं। किशोरी जी के दोनों चरणों के दसों नखों में दस चन्द्रमा उनको उपासना करते हुए चमकते रहते हैं। "कृपालु कहते हैं कि चरणों के नीचे कमल भी सुशोभित है। यह अभूतपूर्व बात है कि चन्द्रमा एवं कमल एक साथ ही विकसित होकर एक ही जगह शोभित हो रहे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 460