श्रीराधा-माधुरी · पद 26
प्रेम रस रूप अगाधा राधा।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prema rasa rūpa agādhā rādhā
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रेम रस रूप अगाधा राधा।
2सोइ बिनु बाधा पाय रास-रस, जोइ राधा आराधा।
3नित्य विहार करति बनि सहचरि, रस न विरह पल आधा।
4रासहिं रिझवत सानुराग नित, ताल राग स्वर साधा।
5निरतत दिव्य हाव-भावन सों, कहि धा तिर-किट-धा-धा-धा।
6लहि “कृपालु” इमि युगल-रास-रस, होति धन्य बिनु बाधा॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी प्रेम-रस एवं रूप की अनन्त राशि हं। उनकी जो उपासना करता है वह सहज ही दिव्य रास-रस प्त करता है। इतना ही नहीं, वह किशोरी जी की सहचरी क उनके साथ नित्य विहार करता है। लिये भी रस का वियोग नहीं हो सकता। राध कर अनुराग-युक्त विविध रागों के द्वारा किशोरी जी के णों को गाकर उन्हें प्रसन्न करता है एवं 'धा-तिर-किट-धा धा'आदि नृत्य के शब्दों का उच्चारण करता हुआ विविध हाव-भाव द्वारा अलौकिक नृत्य करता है। कि वह इस प्रकार सहज ही श्यामा-श्याम के दिव्य प्प्रेमानन्द का निरन्तर अनुभव करता हुआ कृतार्थ रहता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 454-455