श्रीराधा-माधुरी · पद 25
प्रेम-रस-बोरी भानुदुलार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prema-rasa-borī bhānudulāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रेम-रस-बोरी भानुदुलार।
2रतन जटित सिंहासन राजति, लाजत लखि श्रृंगार।
3मणिन-जटित सिर कनक-मुकुट पर, चारु चंद्रिका धार।
4लोचन सलज सहज कजरारे, जलज लजावन हार।
5झुकि झुकि परत नाक नथ-बेसर, लर मोतिन रिझवार।
6कानन करणफूल मणि-मंडित, उर मुक्त न-मणि हार।
7चुनरी नील नील पट कंचुकि, लहँगा नील निहार।
8कर करपत्र चुरी मणि-कंकण, मेंहँदी अरुण सँवार।
9पग जावक “कृपालु” भल पायल, बिछुवनि छवि छविदार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी किशोरी जी प्रेम-रस में सराबोर हैं। जडे हुए रत्नों से युक्त सिंहासन पर सुशोभित हैं एवं उनकी रूप माधुरी को देखकर मूर्तिमान शृंगार भी लज्जित होता है। मणि मंडित स्वर्ण मुकुट पर चन्द्रिका धारण किये हुए हैं। लज्जा रे युक्त नेत्र स्वभावतः कजरारे हैं एवं कमल को भी लज्जित करने वाले हैं। नासिका में सुशोभित नथ और बेसर झूम-झूम कर झोके खा रही है। कान पर्यन्त मोतियों की लड़ का तो कहना ही क्या है! कान में मणियों से जड़े हुए स्वर्ण के कर्णफूल झूम रहे हैं एवं वक्षःस्थल पर मोतियों तथा मणियों के हार अलंकृत हैं। नीले रंग की चुनरी ओढ़े हुए हैं, नीले रंग की ही अंगिया पहने हैं एवं नीले रंग का ही लहंगा धारण किये हैं। हाथों में मणियों के कंकण, करपत्र एवं चूड़ियाँ सुशोभित हैं तथा मेहँदी की रचना तो अत्यन्त ही आकर्षक है। 'कृपालु' कहते हैं- चरण-कमलों में लाल मिहावर शोभायमान है। पायल पहने हुए हैं तथा अंगुलियों में बिछुओं की छवि तो अनिर्वचनीय ही है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 453-454