# प्रेम-रस-बोरी भानुदुलार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0467-M10-K025
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 25
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 218–219

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>प्रेम-रस-बोरी भानुदुलार।  
<a id="line-2"></a>रतन जटित सिंहासन राजति, लाजत लखि श्रृंगार।  
<a id="line-3"></a>मणिन-जटित सिर कनक-मुकुट पर, चारु चंद्रिका धार।  
<a id="line-4"></a>लोचन सलज सहज कजरारे, जलज लजावन हार।  
<a id="line-5"></a>झुकि झुकि परत नाक नथ-बेसर, लर मोतिन रिझवार।  
<a id="line-6"></a>कानन करणफूल मणि-मंडित, उर मुक्त न-मणि हार।  
<a id="line-7"></a>चुनरी नील नील पट कंचुकि, लहँगा नील निहार।  
<a id="line-8"></a>कर करपत्र चुरी मणि-कंकण, मेंहँदी अरुण सँवार।  
<a id="line-9"></a>पग जावक “कृपालु” भल पायल, बिछुवनि छवि छविदार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारी किशोरी जी प्रेम-रस में सराबोर हैं। जडे हुए रत्नों से युक्त सिंहासन पर सुशोभित हैं एवं उनकी रूप माधुरी को देखकर मूर्तिमान शृंगार भी लज्जित होता है। मणि मंडित स्वर्ण मुकुट पर चन्द्रिका धारण किये हुए हैं। लज्जा रे युक्त नेत्र स्वभावतः कजरारे हैं एवं कमल को भी लज्जित करने वाले हैं। नासिका में सुशोभित नथ और बेसर झूम-झूम कर झोके खा रही है। कान पर्यन्त मोतियों की लड़ का तो कहना ही क्या है! कान में मणियों से जड़े हुए स्वर्ण के कर्णफूल झूम रहे हैं एवं वक्षःस्थल पर मोतियों तथा मणियों के हार अलंकृत हैं। नीले रंग की चुनरी ओढ़े हुए हैं, नीले रंग की ही अंगिया पहने हैं एवं नीले रंग का ही लहंगा धारण किये हैं। हाथों में मणियों के कंकण, करपत्र एवं चूड़ियाँ सुशोभित हैं तथा मेहँदी की रचना तो अत्यन्त ही आकर्षक है। 'कृपालु' कहते हैं- चरण-कमलों में लाल मिहावर शोभायमान है। पायल पहने हुए हैं तथा अंगुलियों में बिछुओं की छवि तो अनिर्वचनीय ही है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 453-454

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
