श्रीराधा-माधुरी · पद 24
प्यारी तोरी, वेणी लटक अति प्यारी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pyārī torī, veṇī-laṭaka ati pyārī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्यारी तोरी, वेणी लटक अति प्यारी।
2कारी कारी अति घुँघरारी, अनियारी छवि न्यारी।
3जनु मुख-चंद्र तिरस्कृत-तम भजि, बँध्यो पृष्ठ लट झारी।
4शिखि-कलाप अरु केश परस्पर, तुमुल करत नित भारी।
5लखि विधि दै गलहस्त अर्धशशि, चिह्नपुच्छ-शिखि डारी।
6सब “कृपालु” उपमान प्रकृति-भव, सो चिन्मय छवि वारी॥
हिन्दी भावार्थ
हे किशोरी जी! ही मनोहारिणी है। वह घनी, काली एवं अत्यन्त ही घुँघराली, मानो किशोरी जू के मुख रूपी चन्द्रमा से भगाया हुआ धकार ही पीठ की तरफ बँधा हुआ वेणी के रूप में लटक रहा है। एक बार मोर के पुच्छ-भार ने किशोरी जू के बालों से होड़ करते हुए बहुत वाद-विवाद किया। दोनों ही ब्रह्मा के पास गये। अपमानपूर्वक उसके गले में गलहस्त देकर ढकेल दिया। कारण ही मोर के पंख में हाथ का अर्ध-चन्द्रमा के समान चिह्न बना ठ है।'कृपालु' कहते हैं कि जितने भी उपमान हैं वे सब प्रकृति से उत्पन्न हैं किन्तु किशोरी जी की वेणी तो चिन्मय है अतएव वह समस्त उपमानों से सर्वथा ही अनुपमेय है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 452-453