# बलि जाउँ लली वृषभान की।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0469-M10-K027
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 27
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 219–219

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बलि जाउँ लली वृषभान की।  
<a id="line-2"></a>रूप उजारी भानुदुलारी, प्रानन प्यारी कान्ह की।  
<a id="line-3"></a>रति-रस-बातन, बितवति रातन, घातन नेह सुजान की।  
<a id="line-4"></a>गति गज गामिनि, छवि अभिरामिनि, दुति दामिनि उनमान की।  
<a id="line-5"></a>मंजु निकुंजनि भृंगनि पुंजनि, गुंजनि सुनि किय मान की।  
<a id="line-6"></a>हम “कृपालु” मानिनि लखि स्वामिनि, करत निछावर प्रान की॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

वृषभानुनंदिनी श्रीराधिका जी की मैं बार-बार बलैया लेता हूँ। अनुपम रूप वाली वृषभानुलाड्ली एवं श्यामसुन्दर की प्राणों से भी अधिक प्यारी किशोरी जी की बलैया लेता हूँ। प्रेम की परम अन्तरंग बातों को करते हुए सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत करने वाली एवं प्रेम के मार्मिक विषयों की आचार्या किशोरी जी की बार-बार बलैया लेता हूँ। मतवाले गजराज के समान आ वाली, सुन्दरता को भी लज्जित करने वाली एवं बिजली के समान कान्तिवाली किशोरी जी की बलैया लेता हूँ। मनोहर लताओं के कुंज में भौरों के झुंड के गुंजार को सुनकर मान अवस्था को प्राप्त ( भ्रमरगीत) किशोरी जी की बार-बार बलैया लेता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो किशोरी जी को मान अवस्था में देखकर आनंद में अपने प्राणों को निछावर कर रहा हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 455

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
