श्रीराधा-माधुरी · पद 3
अस भानुलली मुसकान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: asa bhānulalī musakāna re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अस भानुलली मुसकान रे।
2जाकी लखि मुसकान-माधुरी, रहत न कान्हहिं भान रे।
3जगमोहन मदनहुँ मन मोहन, तिन मन मोहिनि जान रे।
4मृदु मुसकनि देखन हित छिन छिन, करत सखिन गुनगान रे।
5मुरि मुरि मधुर मधुर मृदु मुसकनि, लखि भूलत भगवान रे।
6हा हा खात परत पग सखियन, झरि लावत अँसुवान रे।
7जाको लखि “कृपालु” हरि मोह्यो, केहि विधि कौन बखान रे॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी स्वामिनी वृषभानुनन्दिनी की ऐसी मधुर मुस्कान है कि जिसको देखकर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्यामसुन्दर भी अपनी सुधि-बुधि भूल जाते हैं। संसार भर को मोहित करने वाला कामदेव है, उसको भी मोहित करने वाले श्यामसुन्दर हैं एवं श्यामसुन्दर के मन को भी मोहित करने वाली हमारी स्वामिनी हैं, जिनकी मंद मुस्कान देखने के लिए श्यामसुन्दर प्रतिक्षण ललितादिक सखियों के गुणगान किया करते हैं एवं मधुर मुस्कान देखकर अपने आपको भूल जाते हैं सखियों के आगे हा-हा खाते हैं एवं उनके पैर पकड़ कर आँसू बहाते हैं। कृपालु कहते हैं कि जिनकी मुस्कान माधुरी को देखकर ब्रह्म श्यामसुन्दर की यह दशा है, उस मुस्कान-माधुरी का वर्णन कोई कवि कैसे कर सकता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 436