# अस भानुलली मुसकान रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0445-M10-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 209–209

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अस भानुलली मुसकान रे।  
<a id="line-2"></a>जाकी लखि मुसकान-माधुरी, रहत न कान्हहिं भान रे।  
<a id="line-3"></a>जगमोहन मदनहुँ मन मोहन, तिन मन मोहिनि जान रे।  
<a id="line-4"></a>मृदु मुसकनि देखन हित छिन छिन, करत सखिन गुनगान रे।  
<a id="line-5"></a>मुरि मुरि मधुर मधुर मृदु मुसकनि, लखि भूलत भगवान रे।  
<a id="line-6"></a>हा हा खात परत पग सखियन, झरि लावत अँसुवान रे।  
<a id="line-7"></a>जाको लखि “कृपालु” हरि मोह्यो, केहि विधि कौन बखान रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारी स्वामिनी वृषभानुनन्दिनी की ऐसी मधुर मुस्कान है कि जिसको देखकर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्यामसुन्दर भी अपनी सुधि-बुधि भूल जाते हैं। संसार भर को मोहित करने वाला कामदेव है, उसको भी मोहित करने वाले श्यामसुन्दर हैं एवं श्यामसुन्दर के मन को भी मोहित करने वाली हमारी स्वामिनी हैं, जिनकी मंद मुस्कान देखने के लिए श्यामसुन्दर प्रतिक्षण ललितादिक सखियों के गुणगान किया करते हैं एवं मधुर मुस्कान देखकर अपने आपको भूल जाते हैं सखियों के आगे हा-हा खाते हैं एवं उनके पैर पकड़ कर आँसू बहाते हैं। कृपालु कहते हैं कि जिनकी मुस्कान माधुरी को देखकर ब्रह्म श्यामसुन्दर की यह दशा है, उस मुस्कान-माधुरी का वर्णन कोई कवि कैसे कर सकता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 436

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
