श्रीराधा-माधुरी · पद 4
इक देखी छवि मनभावनी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ika dekhī chhavi manabhāvanī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1इक देखी छवि मनभावनी।
2सो छवि लखि लाजति कमला मम, चाल मराल लजावनी।
3अनुपम छवि श्रृंगार माधुरी, प्रेम-सुधा बरसावनी।
4मुरि मुरि बहुरि मधुर मृदु मुसकनि, बरबस रस बरसावनी।
5दृग खंजन चकोर मद गंजन, चितवनि उर हरषावनी।
6पै “कृपालु” जब मान करहिं तब, मानिनि छवि डरपावनी॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर प्रथम बार श्री किशोरी जी को देखकर कहते हैं कि आज मैंने एक मन-मोहिनी छवि देखी है, जिसकी छवि को देखकर मेरी अर्धांगिनी लक्ष्मी भी लज्जित होती है। उसकी चाल हंसों को लज्जित करने बाली है। उस छवि की शृंगार-माधुरी अनुपमेय है। वह प्रेम-सुधा को बरसाने वाली है। मुड़-मुड़कर उसका मधुर-मधुर मुस्कराना बरबस मन को वश में कर रहा था। उसकी आँखें खंजन एवं चकोर पक्षियों के अहंकार को चूर करने वाली थी। उसकी चितवनि हृदय को विभोर कर देने वाली थी। इतने में 'कृपालु' ने कहा कि हे श्यामसुन्दर! यह सब तो ठीक है किन्तु जब यह छवि (किशोरी जी) मान करेंगी तब तुमको डराने वाली भी हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 437