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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 5

करु गुन आगरि-गुन-गान रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karu guna āgari-guna-gāna re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1करु गुन आगरि-गुन-गान रे।

2गुन आगरि नागरि गुन गावत, सुंदर श्याम सुजान रे।

3मणिमय मुकुट चंद्रिका तापर, बिच बिच लर मोतियान रे।

4गौर वदनि मृदु हँसनि, दशन दुति, नील वसन फहरान रे।

5अति भोरी चितवनि ताहू ते, अति भोरी मुसकान रे।

6लालहिं मेंहदी लाल मिहावरि, लाल ललिहिं मुख पान रे।

7अंग अंग श्रृंगार सुशोभित, कहँ लौं करिय बखान रे।

8गुन आगर “कृपालु” नटनागर, प्रानन प्यारी जान रे॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! गुणों की खानि श्री वृषभानुनन्दिनी के गुणगान कर, जिनके गुणगान स्वयं श्री श्यामसुन्दर करते हैं। उनके सिर पर मणियों से जड़ा हुआ मुकुट है, उसके ऊपर चन्द्रिका है एवं बीच-बीच में मोतियों की लड़ियाँ हैं। उनका गौर शरीर, मधुर मुस्कान, दाँतों की चमक एवं नीलाम्बर की फहरान अत्यन्त आकर्षक हैं। उनकी चितवनि अत्यन्त भोली भाली है एवं उससे भी भोली उनकी मधुर मुस्कान है। उनके हाथ में लाल मेहंदी, पैरों में लाल मिहावर एवं मुख में पान की लालिमा है। उनके प्रत्येक अंग सुन्दर शृंगार से सजे हैं, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। 'कृपालु' कहते हैं कि वे अत्यन्त गुणों के सागर रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर की प्राणप्यारी हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 437-438