श्रीराधा-माधुरी · पद 6
कहूँ का छवि सखि! गोरे ग्वाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahūṁ kā chhavi sakhi! gore gwāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहूँ का छवि सखि! गोरे ग्वाल।
2तिरछी बँधी पागरी सिर पर, तिरछी लट घुंघराल।
3तिरछी बँधी मोर की पंखी, तिरछी खौरि सुभाल।
4तिरछी अँखियन चितवनि तिरछी, तिरछी मुरलि रसाल।
5तिरछी पट-दुपटी उर फहरति, तिरछी गल वनमाल।
6तिरछी किंकिनि पायल तिरछी, तिरछी अटपट चाल।
7अति तिरछी मुसकनि “कृपालु” लखि, लाजत तिरछे लाल॥
हिन्दी भावार्थ
किशोरी जी ने श्यामसुन्दर का वेश बनाया है जिसे की अनुपम छवि देखते ही बनती थी। उनके सिर पर तिरछी पगड़ी बँधी थी, उनकी घुंघराली अलकें भी तिरछी थीं, उनके सिर पर चन्द्रिका भी तिरछी बंधी हुई थी, उनके ललाट पर तिलक भी तिरछा लगा था, उनकी आँखें भी तिरछी थीं उनकी विलोकनि भी तिरछी थी, उनकी मुरली भी तिरछी थी। वक्षस्थल पर चिरछा ही दुकूल फहरा रहा था। उनके गले में बनमाला तिरछी थी। उनकी कमर की किंकिनी एवं चरण की पायल भी तिरछी थी। तिरछी ही अटपट चाल थी। ''कृपालु' कहते हैं उनकी मधुर मुस्कान तो सबसे अधिक तिरछी थी जिसको देखकर श्यामसुन्दर भी लज्जित होते थे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 438-439