श्रीराधा-माधुरी · पद 7
करौं का राधा तत्व बखान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: karauṁ kā rādhā-tatva bakhāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1करौं का राधा तत्व बखान।
2शुक सनकादि समाधि साधि जेहि, आराधत धरि ध्यान।
3सोइ ज्योतिर्मय ब्रह्म, राधिका,-पद-नख-मणि-दुति जान।
4ब्रह्महिं-तत्व न जान वेद जब, बुधि अतीत तेहि मान।
5पुनि सो ब्रह्म प्रतिष्ठित जामे, सोई श्याम सुजान।
6सोउ “कृपालु” अवराधत तुमहू, भज राधे तज ज्ञान॥
हिन्दी भावार्थ
राधा-तत्त्व का वर्णन सर्वथा अनिर्वचनीय है। शुक सनकादिक जीवन्मुक्त अमलात्मा परमहँस निर्विकल्प समाधि में ध्यान-द्वारा जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म की आराधना करते हैं, वह ब्रह्म श्री किशोरी जी के चरण-कमलों की नखमणि-चंद्रिका ही है अर्थात् किशोरी जी के चरणों की नख-मणि चंद्रिका को ही रसिक लोग निराकार ब्रह्म मानते हैं। उस निराकार ब्रह्म के ड में ही वेदों का कथन है कि वह ब्रह्म अदृष्ट, अव्यवहार्य भग्राह्म, अलक्षण एवं अचिन्त्य आदि है। फिर वह ब्रह्म भी गीता के अनुसार जिसमें प्रतिष्ठित है, वे ब्रजेनद्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं। कृपालु' कहते हैं कि वेदों के अनुसार वे श्रीकृष्ण भी राधिका की उपासना करते हैं। अतएव राधा-तत्त्व को जानने के चक्कर नँ न पड्कर तुम भी उनकी उपासना करो। वस्तुतस्तु श्री राधा रीकृष्ण की ही आत्मा हैं अतएव जीवात्माओं की भाँति परमात्मा मी अपनी आत्म-स्वरूपा श्री राधा की आराधना करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 439-440