श्रीराधा-माधुरी · पद 8
किशोरी जु कि, मधुर मधुर मुसकान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī ju ki, madhura-madhura musakāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किशोरी जु कि, मधुर मधुर मुसकान।
2नहिं बिसरत मोहिं एकहुँ छिन कहँ, नीलाम्बर लहरान।
3मणिमय मुकुट चंद्रिका तापर, तापर लर मुक्तान।
4एँड़ी कहँ वेणी चूमन चह, बाँकी भृकुटि कमान।
5खंजन-मंजु रसीले नैननि, मोहति श्याम सुजान।
6लखि “कृपालु” हम भोरे मुख पर, वारत तन मन प्रान॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी की मुस्कान अत्यन्त ही मीठी है। नके नीलाम्बर की फहरान मुझे एक क्षण को भी नहीं भूलती। णियों से जड़े हुए उनके मुकुट के ऊपर चन्द्रिका चमक रही है वं उसके ऊपर मोतियों की लड़ियां लटक रही हैं। गो मानो एड़ी को ही चूमना चाहती है। मान अत्यन्त सुन्दर हैं। खंजन पक्षी से भी अत्यन्त सुन्दर उनके स भरे नयन श्याम सुन्दर को मोहित करते हैं। कि हम तो उनके भोले मुख को देखकर ही अपना तन, मन ण सर्वस्व न्यौछावर करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 440