श्रीराधा-माधुरी · पद 9
किशोरी जु कि, भोरेपन की बान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī ju ki, bhorepana kī bāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किशोरी जु कि, भोरेपन की बान।
2भोरे नैन विलोकनि भोरी, जा-वश श्याम सुजान।
3अतिभोरे मुख की अति भोरी, मधुर मधुर मुसकान।
4बलि बलि जात लाल सुनि भोरी, रति-रस की बतियान।
5लखि पिय उर प्रतिबिंब सुभायन, भोरी ठानति मान।
6जान “कृपालु” कला चौसठहूँ, अचरज इहै महान॥
हिन्दी भावार्थ
किशोरी जी का स्वभाव अत्यन्त ही भोलेपन का है। उनकी आँखें एवं चितवनि भी भोली है, जिसके अधीन श्यामसुन्दर सदा रहते हैं। उनके भोले मुख की मीठी मुस्कान भी अत्यन्त भोली है। उनकी प्रेम-रस की भोली बातों को सुनकर श्यामसुन्दर बलिहार जाते हैं। भोले स्वभाव के कारण श्यामसुन्दर के वक्षःस्थल में अपनी ही परछाई देखकर किशोरी जी मान कः लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इतने भोलेपन के साथ यह आश्चर्य है कि वे चौंसठों कला में निपुण हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 441