श्रीराधा-माधुरी · पद 10
किशोरी जू के, रतनारे दोउ नैन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī ju ke, ratanāre dou naina
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किशोरी जू के, रतनारे दोउ नैन।
2सरस सुरति-रस-सरस प्रेम-रस, चुवत मनहुँ दिन रैन।
3अति रसभरे नैनहूँ ते अति, सरस रसीले सैन।
4घायल करत रैन दिन मोहन, नैन सैन अति पैन।
5तदपि विकल पल पल देखन कहँ, बिनु देखे नहिं चैन।
6सो “कृपालु” सुख कौन भने जब, बोलति मधुरे बैन॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी के दोनों नेत्र अत्यन्त ही रतनारे हैं, जिनसे दिन-रात प्रेमामृत का रति-रस चूता रहता है। उनके नेत्रों से भी अधिक सरस उनके मधुर कटाक्ष हैं, जो श्यामसुन्दर को निरन्तर घायल करते रहते हैं। विलक्षणता यह है कि उन्हीं तीखे कटाक्षों को देखने के लिये श्यामसुन्दर प्रतिक्षण बेचैन रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं जब किशोरी जी अत्यन्त मधुर वाणी बोलती हैं वह सुख तो सर्वथा अनिर्वचनीय है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 441-442