श्रीराधा-माधुरी · पद 11
किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī! tore, charanana kī bali jāūṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ।
2जिन युग-चरण अरुणिमा-उपमा, पचिहारी नहिं पाऊँ।
3जपा गुलाल प्रवाल आदि की, उपमा देत लजाऊँ।
4मृदुता में गुलाब नवनी की, समता लखि न सकाऊँ।
5जिन चरनन को चापत हरि नित, का महिमा मैं गाऊँ।
6यह “कृपालु” की चाह रैन दिन, चरनन ध्यान लगाऊँ॥
हिन्दी भावार्थ
हे किशोरी जी!। इन चरणकमलों की लालिमा की उपमा ढूँढकर थक गया महीं नहीं पाता। हीड़ा), गुलाल एवं आम के नये पत्ते आदि की उपमा देने में ज्जा लगती है। गगते हैं। जिन चरणों को निरंतर ही श्रीकृष्ण दबाया करते हैं न चरणों को महिमा मैं क्या कहूँ? री यही अभिलाषा है कि मैं दिन-रात इन्हीं चरणों का ध्यान क्या करूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 442