# किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0453-M10-K011
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 11
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 212–212

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>किशोरी तोरे, चरनन की बलि जाऊँ।  
<a id="line-2"></a>जिन युग-चरण अरुणिमा-उपमा, पचिहारी नहिं पाऊँ।  
<a id="line-3"></a>जपा गुलाल प्रवाल आदि की, उपमा देत लजाऊँ।  
<a id="line-4"></a>मृदुता में गुलाब नवनी की, समता लखि न सकाऊँ।  
<a id="line-5"></a>जिन चरनन को चापत हरि नित, का महिमा मैं गाऊँ।  
<a id="line-6"></a>यह “कृपालु” की चाह रैन दिन, चरनन ध्यान लगाऊँ॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे किशोरी जी!। इन चरणकमलों की लालिमा की उपमा ढूँढकर थक गया महीं नहीं पाता। हीड़ा), गुलाल एवं आम के नये पत्ते आदि की उपमा देने में ज्जा लगती है। गगते हैं। जिन चरणों को निरंतर ही श्रीकृष्ण दबाया करते हैं न चरणों को महिमा मैं क्या कहूँ? री यही अभिलाषा है कि मैं दिन-रात इन्हीं चरणों का ध्यान क्या करूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 442

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
