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श्रीराधा-माधुरी · पद 12

किशोरी मोरी, सरस प्रेम-रस खान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī morī, sarasa-prema-rasa khāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1किशोरी मोरी, सरस प्रेम-रस खान।

2जग आराध्य ब्रह्म-आराधित, रति-रस चतुर सुजान।

3लखि ललितहिं लालिहिं पग चापत, लाल मनहिं ललचान।

4मनिहारिनि लिलिहारिनि बनि बनि, ललिहिं रिझावत कान्ह।

5गहवर-गलिन अलिन सँग हिलिमिलि, विहरति कुंज लतान।

6बनि “कृपालु” जनकादि लतन तरु, लखत त्यागि निज ध्यान॥

हिन्दी भावार्थ

हमारी किशोरी जी मधुर प्रेम रस की खान हैं जिस ब्रह्म की सारा संसार आराधना करता है वह ब्रह्म भी रतिरसनिपुणा किशोरी जी की आराधना करता है। ललिता सखी को किशोरी जी के चरण दबाते देखकर श्यामसुन्दर मन ही मन ललचाते रहते हैं। मनिहारिनि, लिलिहारिन आदि अनेक भेष बनाकर किशोरी जी को रिझाते रहते हैं। किशोरी जी गह्वर वन-लता की कुंजों में सखियों के साथ हिल-मिल कर अनेक प्रकार की मधुर लीलाएँ करती रहती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जनकादिक परमहंस अपने समाधिस्थ ध्यान को छोड़कर लता-वृक्ष बनकर किशोरी जी की लीलाओं की मनोहर झाँकी निहारा करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 443