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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 13

कुँवरि की चितवनि की बलिहार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari kī, chitavani kī balihāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कुँवरि की चितवनि की बलिहार।

2सुधा-गरल-मधु रूप धर्यो जनु, श्वेत श्याम रतनार।

3दृग अंचल चंचल लखि, चंचल, चंचलताहु बिसार।

4रानी, स्वामिनि, सखी, सुता की, चितवनि यदपि निहार।

5पै जब पिय चितवनि सों चितवति, पिय नहिं सकत सँभार।

6हौं “कृपालु” तव सखि, मोहिं सखि लखि, चितवहु सखि अनुहार॥

हिन्दी भावार्थ

श्री किशोरी जी की रस भरी विलोकनि पर हम बलिहार जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे उनकी आँखों में अमृत, विष एवं मदिरा मूर्तिमान होकर श्वेत, कृष्ण एवं लालिमा के रूप में प्रकट हुए हैं। किशोरी जी के चंचल नेत्रों के कटाक्ष को देखकर चंचलता से भी चंचल श्यामसुन्दर अपनी चंचलता खो बैठते हैं। यद्यपि किशोरी जी, रानी, स्वामिनी, सखि एवं सुता की दृष्टि से भी साधकों को अधिकारानुसार देखती हैं, किन्तु जब प्रियतम श्यामसुन्दर को प्रियतम की दृष्टि से देखती हैं तब प्रियतम उस सुख को सर्वसमर्थ होकर भी नहीं सँभाल पाते। कृपालु' कहते हैं-''हे किशोरी जी! हम तुम्हारी सखी हैं अतएव हमें सखी की दृष्टि से ही देखने का अनुग्रह करो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 443-444