# किशोरी जु कि, भोरेपन की बान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0451-M10-K009
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीराधा-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 9
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 211–212

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>किशोरी जु कि, भोरेपन की बान।  
<a id="line-2"></a>भोरे नैन विलोकनि भोरी, जा-वश श्याम सुजान।  
<a id="line-3"></a>अतिभोरे मुख की अति भोरी, मधुर मधुर मुसकान।  
<a id="line-4"></a>बलि बलि जात लाल सुनि भोरी, रति-रस की बतियान।  
<a id="line-5"></a>लखि पिय उर प्रतिबिंब सुभायन, भोरी ठानति मान।  
<a id="line-6"></a>जान “कृपालु” कला चौसठहूँ, अचरज इहै महान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

किशोरी जी का स्वभाव अत्यन्त ही भोलेपन का है। उनकी आँखें एवं चितवनि भी भोली है, जिसके अधीन श्यामसुन्दर सदा रहते हैं। उनके भोले मुख की मीठी मुस्कान भी अत्यन्त भोली है। उनकी प्रेम-रस की भोली बातों को सुनकर श्यामसुन्दर बलिहार जाते हैं। भोले स्वभाव के कारण श्यामसुन्दर के वक्षःस्थल में अपनी ही परछाई देखकर किशोरी जी मान कः लेती हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इतने भोलेपन के साथ यह आश्चर्य है कि वे चौंसठों कला में निपुण हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 441

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
