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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 2

अलि! लखु आजु लली सिंगार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: alī! lakhu, āju lalī siṅgāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अलि! लखु आजु लली सिंगार।

2अंग त्रिभंग ढंग नँदनंदन, रंग अनंग निहार।

3सुवरन वरन गौर तनु सुवरन, नील वरन हरि वार।

4सुवरन वरन तिलक भल सुवरन, सुवरन खौरि सँवार।

5सुवरन वरन पीतपट सुवरन, सुवरन काछनि धार।

6सुवरन मुकुट लकुटि वर सुवरन, सुवरन सुवरन हार।

7सुवरन कुण्डल सुवरन नूपुर, सुवरन पग रिझवार।

8सुवरन कंकन सुवरन किंकिनि, सुवरन छवि छविदार।

9सुवरन वरन “कृपालु” हरन मन, मृदु मुसकनि बलिहार॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! श्री वृषभानुनन्दिनी का शृंगार देख। नन्दनन्दन के समान तीन स्थान से टेढ़ी होकर उन्हीं के समान समस्त अभिनय कर रही हैं। जिसको देख कर कामदेव को यह आश्चर्य हो रहा है कि नँदनन्दन का रंग गोरा कैसे हो गया। किशोरी जी का गोरे रंग का शरीर सुवर्ण के समान सुन्दर रंग का है जिसको देखकर नील वर्ण के श्यामसुन्दर को न्यौछावर किया जा सकता है। सुवर्ण के समान पीले रंग का तिलक एवं सुवर्ण के समान सुन्दर वर्ण वाली ललाट की खौरि अत्यन्त ही शोभा दे रही है। सुवर्ण के रंग के समान सुन्दर वर्ण वाला पीताम्बर पहने हुए हैं एवं सुन्दर वर्ण की कछनी काछे हैं। सुवर्ण के मुकुट, सुवर्ण की लठिया एवं सुवर्ण के ही सुन्दर वर्ण वाले हार अत्यन्त ही शोभनीय हैं। कानों में सुवर्ण के कुंडल, चरणों में सुवर्ण के नूपुर अत्यन्त ही सुन्दर लग रहे हैं। हाथ में सुवर्ण के कंकण, कमर में सुवर्ण की किंकिणि है। कृपालु' कहते हैं कि सुन्दर वर्ण वाली, मन को हरने वाली किशोरी जी की मधुर मुस्कान पर मैं बलिहार जाता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 435-436