श्रीराधा-माधुरी · पद 1
अलिन सँग सोहति भानुलली।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: alina saṁga sohati bhānulalī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अलिन सँग सोहति भानुलली।
2नित नव लीला करति अलिन सँग, गहवर-कुंजगली।
3गौर बदनि, मृदु हँसनि दशन-दुति, दमकति जनु बिजुली।
4मणि-मंडित सिर कनक मुकुट पर, लर मोतिन अवली।
5सिर चूनरि नासा नथ बेसर, लखतहिं बनत अली।
6लखि “कृपालु” तनु सुधि बिसरावत, जासु कंध कमली॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनन्दिनी राधिकाजी अपनी अन्तरंग सखियों के साथ क्या ही शोभा पा रही हैं! उन्हीं सखियों के साथ गह्वर-वन की कुंज गलियों में नित्य नई-नई सरस लीलागयें करती हैं। उनका गोरा शरीर एवं मंद-मंद मुस्कराना ऐसा शोभनीय लगता है मानो सफेद दाँत बिजली बनकर चमक रहे हों। स्वर्ण के मुकुट पर मणियाँ जड़ी हुई हैं तथा मोतियों की लड़ियों का श्रृंगार है। सिर पर चुनरी एवं नासिका में नथ बेसर की झाँकी तो बस झाँकते ही बनती है। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी की रूप माधुरी का कौन वर्णन कर सकता है, जिन्हें देखकर काली-कमली-वाले बनमाली श्यामसुन्दर भी अपनी सुधि-बुधि खोये बैठे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 434-435