श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 54
हमारो साँचो मीत गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro, sāṁcho mīta gopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो साँचो मीत गोपाल।
2मणिन जटित सिर कनक मुकुट जनु, बहुरंगी बिधु-बाल।
3तापर मोरपुच्छ झुकि झूमत, लहि प्रमत्त गज-चाल।
4कारी लट बल खाति एक सँग, जनु अगनित तिय व्याल।
5गोल कपोल लोल श्रुति कुंडल, लोचन चपल विशाल।
6भृकुटी रुचिर नासिका बेसर, केसर तिलक सुभाल।
7दुहुँन कंध लकुटी अरु कामरि, बैनन बेनु रसाल।
8चितवनि हँसनि गवनि लखि ज्ञानी, सनकादिक बेहाल।
9करत “कृपालु” केलि गोपन सँग, ललित त्रिभंगी लाल॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे वास्तविक प्रियतम श्रीकृष्ण हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण के मुकुट में जड़ी हुई मणियाँ इस प्रकार शोभा पा रही हैं मानो विविध रंग के बाल-चन्द्र खिले हुए हैं। उस मुकुट के ऊपर उनकी मतवाली गज चाल के कारण मोर का पंख बार-बार झुक-झुक कर झूम रहा है। उनके घुँघणले बाल अत्यन्त ही टेढ़े हैं, मानो असंख्यों सर्पिणियाँ लटक रही हैं। उनके सुन्दर गोल गालों पर कान का कुंडल चपलतापूर्वक अत्यन्त ही सुन्दर तथा नाक में बेसर एवं ललाट में केशर का तिलक शोभित हो रहा है। उनके एक कंधे पर लठिया एवं दूसरे कंधे पर कामरी है, लठिया के ऊपर हाथ रखकर मधुर मुरली बजा रहे हैं। उनका देखना, हँसना, चलना आदि देख कर नित्य जीवनमुक्त ज्ञानी सनकादिक भी प्रेम में विभोर हो जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसे सरस त्रिभंगी लाल श्यामसुन्दर ग्वालबालों के साथ खेल रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 432-433