# हमारो साँचो मीत गोपाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0442-M09-K054
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 54
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 207–207

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारो साँचो मीत गोपाल।  
<a id="line-2"></a>मणिन जटित सिर कनक मुकुट जनु, बहुरंगी बिधु-बाल।  
<a id="line-3"></a>तापर मोरपुच्छ झुकि झूमत, लहि प्रमत्त गज-चाल।  
<a id="line-4"></a>कारी लट बल खाति एक सँग, जनु अगनित तिय व्याल।  
<a id="line-5"></a>गोल कपोल लोल श्रुति कुंडल, लोचन चपल विशाल।  
<a id="line-6"></a>भृकुटी रुचिर नासिका बेसर, केसर तिलक सुभाल।  
<a id="line-7"></a>दुहुँन कंध लकुटी अरु कामरि, बैनन बेनु रसाल।  
<a id="line-8"></a>चितवनि हँसनि गवनि लखि ज्ञानी, सनकादिक बेहाल।  
<a id="line-9"></a>करत “कृपालु” केलि गोपन सँग, ललित त्रिभंगी लाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारे वास्तविक प्रियतम श्रीकृष्ण हैं। जिनके सिर पर स्वर्ण के मुकुट में जड़ी हुई मणियाँ इस प्रकार शोभा पा रही हैं मानो विविध रंग के बाल-चन्द्र खिले हुए हैं। उस मुकुट के ऊपर उनकी मतवाली गज चाल के कारण मोर का पंख बार-बार झुक-झुक कर झूम रहा है। उनके घुँघणले बाल अत्यन्त ही टेढ़े हैं, मानो असंख्यों सर्पिणियाँ लटक रही हैं। उनके सुन्दर गोल गालों पर कान का कुंडल चपलतापूर्वक अत्यन्त ही सुन्दर तथा नाक में बेसर एवं ललाट में केशर का तिलक शोभित हो रहा है। उनके एक कंधे पर लठिया एवं दूसरे कंधे पर कामरी है, लठिया के ऊपर हाथ रखकर मधुर मुरली बजा रहे हैं। उनका देखना, हँसना, चलना आदि देख कर नित्य जीवनमुक्त ज्ञानी सनकादिक भी प्रेम में विभोर हो जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसे सरस त्रिभंगी लाल श्यामसुन्दर ग्वालबालों के साथ खेल रहे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 432-433

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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