श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 53
हमारो श्री वृंदावन चंद।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro shrī vṛindāvana chanda
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो श्री वृंदावन चंद।
2सद्घन चिद्घन आनँदघन जोइ, बन्यो सोइ नँदनन्द।
3परमात्मा की परम आत्मा, राधा कह श्रुति छंद।
4युगल एकरस रस बरसावत, सरस रास आनंद।
5वृंदावन निधिवन गहवरवन, विहरत आनँदकंद।
6फिरत “कृपालु” शंभु से जिनके, परे प्रेम के फंद॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे सर्वस्व एकमात्र श्री वुन्दावन बिहारी श्यामसुन्दर ही हैं। जो सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म कहलाता है वही ब्रज में नन्दनन्दन बनकर अवतीर्ण हुआ है। आत्मा को वेदों ने राधा तत्त्व घोषित किया है। निरन्तर सरस रास-रस बरसाते हुए रासाधिकारियों को सरस रस प्रदान करते हैं। कभी वृन्दावन में, कंभी निधिवन में और कभी गह्दर वन में आनन्दकन्द नन्दनन्दन विहार करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि भगवान् शंकर सरीखे भी इनके प्रेम पाश में बँधे हुए ब्रजवीथियों में चक्कर लगाया करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 431-432