# हमारो श्री वृंदावन चंद।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0441-M09-K053
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 53
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 206–207

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारो श्री वृंदावन चंद।  
<a id="line-2"></a>सद्घन चिद्घन आनँदघन जोइ, बन्यो सोइ नँदनन्द।  
<a id="line-3"></a>परमात्मा की परम आत्मा, राधा कह श्रुति छंद।  
<a id="line-4"></a>युगल एकरस रस बरसावत, सरस रास आनंद।  
<a id="line-5"></a>वृंदावन निधिवन गहवरवन, विहरत आनँदकंद।  
<a id="line-6"></a>फिरत “कृपालु” शंभु से जिनके, परे प्रेम के फंद॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारे सर्वस्व एकमात्र श्री वुन्दावन बिहारी श्यामसुन्दर ही हैं। जो सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म कहलाता है वही ब्रज में नन्दनन्दन बनकर अवतीर्ण हुआ है। आत्मा को वेदों ने राधा तत्त्व घोषित किया है। निरन्तर सरस रास-रस बरसाते हुए रासाधिकारियों को सरस रस प्रदान करते हैं। कभी वृन्दावन में, कंभी निधिवन में और कभी गह्दर वन में आनन्दकन्द नन्दनन्दन विहार करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि भगवान् शंकर सरीखे भी इनके प्रेम पाश में बँधे हुए ब्रजवीथियों में चक्कर लगाया करते हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 431-432

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
