श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 32
वारी हौं, वारी छवि, पीतपट वारी पै।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: vārī hauṁ, vārī chhavi, pītapaṭa-vārī pai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1वारी हौं, वारी छवि, पीतपट वारी पै।
2मणिन-जटित, कनक-मुकुट, लटनि-लटक कारी पै।
3मुरलि-मधुर, मधुर-अधर, तान सुघर प्यारी पै।
4मणिन-माल, मुक्त -माल, गुंजमालधारी पै।
5नील-गाल, झलक-हलक, कुंडल छवि न्यारी पै।
6कह “कृपालु” , अति रसाल, चालहिं गिरिधारी पै॥
हिन्दी भावार्थ
अरी वीर! मैं तो पीताम्बर वाली मनोहारी रूप धुरी पर वारी-वारी जाती हूँ। मणि मण्डित स्वर्ण के मुकुट वं घुंघराली लटों की लटक पर वारी-वारी जाती हूँ। सुन्दर धरों पर धरी मधुर मुरली की प्यारी तान पर वारी-वारी री जाती हूँ। नीले गालों पर हिलते हुए सुवर्ण के कुण्डल की लक पर वारी-वारी जाती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं-हम तो दलाल की अत्यन्त रसाल बाल मराल के समान मतवाली ल पर बलिहार जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 416