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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 33

श्याम की मंद मंद मुसकान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma kī manda manda musakāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्याम की मंद मंद मुसकान।

2बिसरत नाहिं सखी एकहुँ छिन, पीतांबर फहरान।

3मटकनि-मुकुट लटनि की लटकनि, अटक्यो तन मन प्रान।

4अति रस भरे नैन सों हेरत, टेरत मुरली-तान।

5नित्य-विहार करत वृंदावन, मंजुल-कुंज लतान।

6लखि “कृपालु” छुटि जात समाधिन, शिव सनकादिक ध्यान॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! श्यामसुन्दर की मन्द-मन्द मुस्कान एर पीताम्बर की फहरान एक क्षण को भी नहीं भूलती। उनवे मुकुट के झूमने एव घुँधराले बालों के लटकने पर मेरा तन मन, प्राण अटका हुआ है। वे अत्यन्त रसीली आँखों से देख हुए मुरली की तान छेड़ते हैं वे वृन्दावन की सुन्दर लता कुंज में नित्य विहार करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उन्हें देर कर शिव सनकादिक परमहँसों का समाधिस्थ ध्यान भी छू जाता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 417