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श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 34

श्याम के जादू भरे दौउ नैन।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma ke jādū bhare dou naina

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1श्याम के जादू भरे दौउ नैन।

2बनि निर्दयी दई!! उर मारत, तकि तकि नैनन सैन।

3इमि घायल करि मोहिं बेदरदी, बोलत अटपट बैन।

4मंद मंद मुसकात ताउ पै, छीनि सबै सुख चैन।

5जिन देख्यो इन नैन भूलिहूँ, तलफत तिन दिन रैन।

6धनि “कृपालु” तिन जनम सूर जिन, नैनन-बान परै न॥

हिन्दी भावार्थ

श्री श्यामसुन्दर के नेत्र जादू-भरे हैं। हाय दई! नैनों के कटाक्ष से अत्यन्त निर्दयी बनकर बार-बार बाण मारते हैं एवं मुझे घायल करके अटपटी बातें करते हैं। मेरे समस्त लौकिक सुख छीनकर भी मन्द-मन्द मुस्कराते हैं। जिसने भूलकर एक बार भी इन आँखों को देख लिया, बस सदा के लिये वह तड़पने लगा। 'कृपालु' कहते हैं कि इस दृष्टि से तो जन्मान्ध ही बहुत अच्छे हैं जिनको नैन-बाण आदि का कुछ भय तो नहीं है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 417-418