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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 35

सखि! अस रस मोहन मुसकान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhī! asa rasa mohana musakāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सखि! अस रस मोहन मुसकान।

2जा रस बस बरबस बिसरावत, शंभु समाधिन ध्यान।

3पुनि चह सखिन लखन बारेक लखि, नहिं अघात अँखियान।

4प्रति मुसकान लखत कह पुनि पुनि, अस मुसकान न आन।

5कहत रहन चह नैन रोम प्रति, विधि विधिताहुँ न जान।

6कह “कृपालु” प्रतिरोम लखतहूँ, सुरपति नाहिं अघान॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! मनमोहन की मंद-मुस्कान में ऐसा परस रस है, जिसके अधीन होकर भगवान् शंकर अपनी समाधि का ध्यान भी भुला देते हैं। सखियाँ उस मुस्कान को देखकर बार-बार देखने को व्याकुल रहती हैं, तृप्ति नहीं होती। प्रत्येक मुस्कान को देख कर सखियाँ ऐसा अनुभव करती हैं कि इस मुस्कान का-सा रस और मुस्कानों में नहीं था। और यह भी कहती हैं कि बजाने वाले (विधाता) को नाना नहीं आया, उसे तो रोम-रोम में प्रियतम के दर्शनार्थ त्र बनाना चाहिये था। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! यह रा भ्रम है। रोम-रोम में नेत्र होने से भी उस अनन्त सुखयुक्त मुस्कान-माधुरी से तृप्ति नहीं हो सकती। इसका उदाहरण प्रति रोम में नेत्रयुक्त स्वर्ग सम्राट इन्द्र है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 418-419