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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 36

सजीले छैल छबीले श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sajīle chhaila chhabīle shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सजीले छैल छबीले श्याम।

2रसिक रँगीले, गुन गर्वीले, चटकीले छविधाम।

3नीले तन पर अम्बर पीले, चमकीले अभिराम।

4सरस-रसीले दृगन गँसीले, सी ले मन ब्रज बाम।

5चलि लचकीले सखि मन कीले, मुरली ले तिन नाम।

6अस पी ले “कृपालु” रस पी ले, ही ले धरि अविराम॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर अत्यन्त ही मनोरम हैं। रसिकों को रस देने वाले दिव्य गुणों के मद में चूर दिव्य चमक वाले एवं रूप के सागर हैं। दिव्य चमक वाले सुन्दर पीले वस्त्र शोभायमान हैं। अधिक रसीले चुभने वाले उनके कटाक्ष बरबस ब्रजांगनाओ के मन को वश में कर लेते हैं। के मन को समाधिस्थ कर देती है। नाम गान करते हैं। पाकर तू भी दिव्य प्रेम रस का पान कर ले एवं अनन्त काल वे लिये उनको अपने में रख ले।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 419