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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 31

लाल के घूँघर वारे बाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāla ke ghūṁghara vāre bāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1लाल के घूँघर वारे बाल।

2लगे उखारन कौरव पुरि जब, बल यमुनहिं हल डाल।

3तब जैसी यमुनहिं भँवरिनि परि, तैसेहिं लट घुँघराल।

4कबहुँक विहरत हरि-मुख ऊपर, कबहुँक विहरत भाल।

5कबहुँक पियत अधर रस कबहुँक, चूमत नीले गाल।

6जब “कृपालु” उड़ि परत दृगन महँ, टारत निज कर लाल॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर की लटें अत्यन्त घुँघराली हैं। जब बलराम न हस्तिनापुर को उखाड़ने के लिये यमुना के बीच में हल डाला था तब यमुना में जैसी भँवरियाँ पड़ी थीं, वैसी ही लटें पी घुँघराली हैं। ये घुँघराले बाल कभी तो श्यामसुन्दर के मुख क ऊपर विहार करते हैं एवं कभी ललाट के ऊपर विहार रते हैं। कभी श्यामसुन्दर के अधरामृत का पान करते हैं एवं भी नीले गाल को भी चूम लेते हैं। "कृपालु 'के शब्दों में ये जब अनधिकार चेष्टा करते हुए आँखों में उड़कर पड़ ते हैं तब श्यामसुन्दर इनको अपने कर कमल से हटाते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 415-416