श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 30
लाल की अति मतवाली चाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāla kī ati matavālī chāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लाल की अति मतवाली चाल।
2चलत घूमि झुकि झूमि झूमि अति, लटपटात गोपाल।
3मो कहँ जानि परत इनहिंन ते, सीखी चाल मराल।
4पुनि इनहिंन ते सीखी उनहुँन, हस्तिन-चाल रसाल।
5लखि सो चाल न घायल हो जो, नहिं त्रिभुवन अस बाल।
6कहँ लौं कहिय “कृपालु” चाल ते, भोलेनाथ बेहाल॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर की चाल अत्यन्त ही मतवाली है। वे झुक-झुककर, झूम-झूमकर, घूम-घूमकर अत्यन्त लटपटाती हुई चाल से चलते हैं। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हीं से हंसों ने भी चलना सीखा है एवं इन्हीं से मतवाले हाथियों ने भी चलना सीखा है। त्रैलोक्य में ऐसी कोई सुन्दरी नहीं है जो कृपालु' कहते हैं कि उस चाल का वर्णन कहाँ तक करूँ साक्षात् भोलेनाथ भी उसे देखकर पागल हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 415