श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 29
लतन में ठाढ़ो सुंदर श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: latana meṁ ṭhād̤ho sundara shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लतन में ठाढ़ो सुंदर श्याम।
2ग्रीवा-कटि-पद भंगि मनोहर, लजवत कोटिन काम।
3मुरली मधुर अधर धरि टेरत, लै ललितादिक नाम।
4परिमल-सारस-केशर-चंदन, चर्चित तनु अभिराम।
5नख शिख सब श्रृंगार सुशोभित, सुषमा सींव ललाम।
6लखि “कृपालु” छवि छकी रहें नित, सिगरी ब्रज की बाम॥
हिन्दी भावार्थ
लताओं के बीच में लाल जी खड़े हैं। वे ग्रीवा कमर एवं पैरों को अति विचित्र ढंग से झुकाए हुए इतने सुन्दर लगते हैं कि उनके आगे करोड़ों कामदेव लज्जित हो जाते हैं। वे ललितादिक सखियों का नाम विश्व विमोहिनी मुरली में लेते हुए मुख से परम मधुर मुरली की तान छेड़ रहे हैं। अगर कस्तूरी केसर, चंदन आदि का सुगन्धित लेप शरीर में लगा हुआ है। नख से शिख तक समस्त शृंगार से शोभित हो रहे हैं। कृपालु' कहते हैं कि ऐसे ललित त्रिभंगी लाल को देख कर समस्त ब्रजगोपांगनाएं निरन्तर ही प्रेम-विभोर रहती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 414